अभी कुछ दिनो पहले अमेरिका से मै लौट कर आया हूँ. वहाँ बहुत कुछ अच्छा देखने को मिला कुछ खराब देखने को मिला. यहाँ तक तो ठीक है लेकिन मुझे बहुत कुछ अजीब सा देखने को मिला. उसका एक उदाहरण मै सबुत के तौर पर भारत लाया हूँ. फोटो पर क्लिक कर बड़ा कर लेँ और गौर से पढें.
बहुत पहले मैने लिखा था कि शौच और सिविलाइजेसन मे अन्योन्यश्रित सम्बन्ध हैं. लेकिन नीचे दिए गए चित्र को देखकर बोलिए अमेरिका सिविलाज्ड है या नही...
यह चित्र मेरे कार्यालय के बाथरूम का है. नोटिस मे लिखा है सभी कर्मचारी का हाथ धोना आवश्यक है. बाथरूम मे कोई हाथ कब धो सकता है अब आप खुद समझ लीजिए. लेकिन मेरे समझ मे एक बात अभी तक नही आया कि अमेरिका का सिविलाज्ड लोग यदि कागज से पोंछ लेने को पर्याप्त मानते हैँ तो इस तरह की नोटिस क्योँ लगाते हैँ. अजी साधारन सी बात है आप कागज से पोछ लेने के बाद, पैन्ट्री मे जाकरे केक खाएँगे काफी पीएँगे और जनाब यदि आपको किसी ने बाथरूम से आकर सीधे केक पर टूटते देखा तो घिन्न आएगी कि नहीँ ? चाहे आप अमेरिका मे रहेँ या हिन्दुसतान मे. अत: यह बात तो साबित होता है कि शौच के बाद पानी से धोना आवश्यक है. लेकिन अमेरिका वाले ऐसा क्योँ नही करते. इस बात पर शोध होना जरूरी है. मेरे दिमाग मे भी यही प्रश्न उठे जा रहे हैँ, कि नदी घाटी कि सभ्यता के रुप मे दूनियाँ कि सभ्यता यदि नदी किनारे विकसित हुई थी तो अमेरिका वालोँ ने कागज से पोछना कैसे शुरु किया. अजीब बात है कागज से पोछने का आदत भी डलवाते हो और आफिस मे नोटिस लगवाते हो कि हाथ धोना आवश्यक है.
वो क्या है कि मुझे बहुत दिनो से बकवास करने का मन कर रहा था लेकिन समय है कि मिलता ही नही था. मै बकवास ना करू तो अपच हो जाता है और उस बकवास का सड़ान्ध दूर-दूर तक फैलता है. जब कभी दूसरे का बकवास पढू तो उसमे और उबाल आता है, इस बार भी उबाल आया और उपर से कल स्वतंत्रता दिवस अलग से. कल आफिस आने का कोई झँझट नही, उपर से देर तक सोते रहने के वाला घेलुआ.
सो बकवास करने तो बैठ गया लेकिन बकवास क्या करूँ वह पता नही. इसीलिए गलत गलत बातेँ निकल रही हैँ. टी.वी. चैनल के बारे मे लिखूँ लेकिन क्या लिखूँ, एक भी चैनल तो सही हो कि दूसरे की बुराई किया जाए. राजनीति की बात करूँ, अरे भैय्या इतने सारे बकवास सामने आ जाएगा कि उसमे से कोई एक चुनना मुश्किल हो जाएगा. पिछले दिनो हुए घटनाक्रम पर बकवास करूँ, क्या करूँगा बकवास करके, प्रतिभा पाटिल और अब्दूल कलाम मे अन्तर ढूँढ कर. प्रतिभा पाटिल तो राष्ट्रपति भवन मे पोहा का नास्ता फरमा रही होगी और मेरी बीवी उस बकवास को पढकर बोलेगी इससे अच्छा तो अपने बेटे के साथ टाईम गुजारते. लेकिन देश के रष्ट्रपति हैँ सो दिमाग हँटाने से नही हँटता. बकवास करने का भी मन करता है और नही भी. तो चलिए लिखिए देते हैँ. लेकिन दो लाईन से ज्यादा नही लिखेँगे. अरे भाई मेरी भी तो कुछ इज्जत है.
सन १९१९ की बात है. जार निकोलस द्वितीय के समय मे राष्पुटीन नामक एक पथभ्रष्ट पादरी हुआ करता था. कहा जाता है कि जार निकोलस द्वितीय और उनकी पत्नी जरीना उस पथभ्रष्ट पादरी के हाथों का एक पुतला मात्र था. पादरी जार और जरीना को जो जो बोलता वे लोग ऐसा ही करते. कहा ये भी जाता है कि जरीना का उस पथभ्रष्ट पादरी के साथ सम्बन्ध (अवैध ही समझिए) थे. उस पथभ्रष्ट पादरी ने कोई नेक सलाह दिया हो चाहे नही, लेकिन जार और जरीना का मिट्टी पलेत कर दिया. बेचारा कही का नही रहा. अब क्या है कि मै अपने इस बकवास से पाठको को गोल गोल नही घुमा रहा हूँ. वो क्या है कि एक घँटे बात बाद प्रतिभा पाटिल का देश के नाम सँदेश आएगा. उसको मै झुठलाना भी नही चाहता. और इस किस्से को आगे भी नही बढाना चाहता. तो पाठक गण केवल इतना समझ लेँ, कि जब हमारे पास सोनियाँ, मनमोहन और प्रतिभा है तो जार, जरीना और पथभ्रष्ट पादरी का उदाहरण क्योँ. अजी घर की मुर्गी दाल बराबर.
कोशिश करता रह गया लेकिन ढँ का विषय हाथ नही लगा. जब लगेगा तो फिर बकवास करेँगे.

6 comments:
हा हा मस्त है!! वैसे प्रभु जब ढंग का विषय नही मिला तो आप इतना कुछ कह गए, मान लो ढंग का विषय मिल गया तो………………!!
बीच में कहां गायब हो गए थे आप!!
स्वतंत्रता दिवस की बधाई व शुभकामनाएं
वो तो ठीक है बंधु, पर आपने हाथ धोकर टाइप किया या नहीं. कुछ खुशबू तो - अनधुले हाथों की - आपके लेखन से आ ही रही है :)
:)
स्वतंत्रता दिवस की बधाई व शुभकामनाएं
mast hai...
रवि जी;
हम अमेरिकन नही, हम तो ठहरे भारतीय. बचपन से पानी से धोना सीखा है, भले ही लोटा का प्रयोग खुले खेत मे करेँ लेकिन उसके बाद हाथ जरूर धोया जाता है. लेकिन अमेरिका मे रहने से बुद्धि जरूर कुँठित हो गई थी.
सँजीत जी हम गायब नही हुए थे, कुछ व्यस्त थे. अब शिकायत का मौका नही मिलेगा.
बढिया.. यदि खाना न भी खाना हो तो भी हाथ धोने में क्या बुराई है, लेकिन अमेरिकन लोग क्या समझें...
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